Tuesday, June 16, 2015

मुग़ल वंश का संक्षिप्त इतिहास

पंद्रहवीं सदी के शुरुआत में मध्य एशिया में फ़रगना के राजकुमार जाहिरुद्दीन को निर्वासन भुगतना पड़ा। उसने कई साल गुमनामी में रहने का बाद अपनी सेना संगठित की और राजधानी समरकंद कर धावा बोला। इसी बीच उसकी सेना ने उससे विश्वासघात कर दिया और वो समरकंद तथा अपना ठिकाना दोनों खो बैठा। अब एकबार फिर उसे गुमनामी में रहना पड़ा। इसबार वो भागकर हिन्दुकूश पर्वत पारकर काबुल आ पहुँचा जहाँ इसके किसी रिश्तेदार ने उसको शरण दी और वो फारसी साम्राज्य का काबुल प्रान्त का अधिपति नियुक्त किया गया। यहीं से शुरु होती है बाबर की कहानी। जाहिरूद्दीन ही बाबर था जिसे मध्य एशिया में बाबर नाम से बुलाया जाता था क्योंकि उन अर्धसभ्य कबाईली लोगों को जाहिरुद्दीन का उच्चारण मुश्किल लगता था।
काबुल में रहते रहते मुहम्मद शायबानी ने उसे समरकंद पर आक्रमण करने में मदद की। हालाँकि वह इसमें विजयी रहा पर एकबार फिर उसे यहाँ से भागना पड़ा और समरकंद उसके हाथों से फिर निकल गया। इसके बाद शायबानी ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के खिलाफ़ युद्ध किया। इसमें लोदी की सेना बहुत बड़ी थी लेकिन फिर भी शायबानी और उसके सहयोगी बाबर जीतनें में सफल रहे। इसके साथ ही भारत में एक ऐसे वंश की नींव पड़ चुकी थी जिसने अगले कोई ३०० वर्षों तक एकछत्र राज्य किया।
बाबर को कई राजपूत विद्रोहों का सामना करना पड़ा था जिसमें राणा सांगा की मु़खालिफ़त (विरोध) बहुत भयानक थी और ये माना जा रहा था कि बाबर, जो ऐसे भी जीवन मे युद्ध करते करते थक और हार चुका है, आसानी से पराजित हो जाएगा। पर राणा संगा के एक मंत्री ने उन्हें युद्ध में धोखा दे दिया और इस तरह बाबर लगभग हारा हुआ युद्ध जीत गया। इसके बाद बाबर के पुत्र हुमाय़ुं को भी कई विद्रोहों का सामना करना पड़ी। दक्षिण बिहार के सरगना शेरशाह सूरी ने तो उसे हराकर सत्ताच्युत भी कर दिया औप हुमाँयु को जान बचाकर भागना पड़ा। लेकिन ५ साल के भीतर उसने दिल्ली की सत्ता पर वापस अधिकार कर लिया जिसके बाद अगले ३००सालों तक दिल्ली की सत्ता पर मुगलों का ही अधिकार बना रहा।
हुमायुँ का पुत्र अकबर एक महान शासक साबित हुआ और उसने साम्राज्य विस्तार के अतिरिक्त धार्मिक सहिष्णुता तथा उदार राजनीति का परिचय दिया। वह एक लोकप्रि। य शासक भी था। अकबर ने कोई ५५ साल शासन किया। उसके बाद जहाँगीर तथा शाहजहाँ सम्राट बने। शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण करवाया जो आज भी मध्यकालीन दुनिया के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। इसके बाद औरंगजेब आया। उसके शासनकाल में कई धार्मिक था सैनिक विद्रोह हुए। हालाँकि वो सभी विद्रोहों पर काबू पाने में विफल रहा पर सन् १७०७ में उसकी मृत्यु का साथ ही साम्राज्य का विघटन आरंभ हो गया था। एक तरफ मराठा तो दूसरी तरफ अंग्रेजों के आक्रमण ने दिल्ली के शाह को नाममात्र का शाह बनाकर छोडा। जैबुन्निसा और आलिकखान
एक बार औरंगजेब आब-ओ-हवा परिवर्तन के लिए लाहौर गया साथ में उसकी लडकी जैबुन्निसा भी गई। वह बडी खूबसूरत और हसीन थी। बुद्धि में भी बडी तेज थी तथा उसे कविता और साहित्य का बडा शौक था। उन दिनों औरगंजेब के राज्य का प्रसिद्ध प्रशासक आलिकखान लाहोर का गर्वनर था औरगंजेब के लाहौर में होने के कारण वह पहरेदारों पर कडी नजर रखता था वह औरगंजेब के सर्वोतम कर्मचारीयों में से एक था तथा औरगंजेब ने अपनी बहादुरी ताकत उंचे खयाल रखता था आकिलखान ने अपनी बहादुरी ताकत तथा दयालु स्वभाव के कारण सबके दिलो को जीत लिया था मुहब्बत का शिकार जैबुन्निसा ने पहले ही आलिकखान के बारे में बहुत कूछ सून लिया था परन्तु जब वह महल में बार बार आने लगा तब उसको पास से देखने और सुनने का भी उसको मौका मिला अब वह अपने हदय क भावों को नह छिपा सकी और उसने आलिकखान के सामने अपने प्रेम को प्रकट कर दिया आलिकखान भी जैबुन्निसा की मुहब्बत का शिकार हो चुका था वह राजकुमारी के प्रेम के लिये हर तरह की कुर्बानी करने के लिए तैयार था जैबुन्निसा हर रोज आलिकखान से मिलने के लिए बैचेन रहती और आलिकखान कहीं न कहीं समय निकालकर उससे मिल लिया करता कभी कभी वह बभोलेपन के आकिलखान से पूछती क्या तुम्हे बादशाह से डर नहीं लगता मैं तुम्हारी इस नजर से ज्यादा डरता हुं बादशाह का मुझे डर नहीं आकिलखान निडरता से उतर देता है कभी कभी जैबुन्निसा पुछती जब प्यार सीमा से बाहर हो जाता है तब क्या वह कम नहीं होता वह जबाव देता प्यार सागर की तरह महान है उसकी गहराई को नापा नहीं जा सकता वह आकाश की तरह सीमा से परे ह इन सुनहले दिलों का आखिर अन्त आ गया अपना स्वास्थ्य ठीक होता देख औरंगजेब ने वापस राजधानी जाने का विचार किया उस समय आकिलखान अपनी महबुबा से मिलने गया और बोला मेरी रानी आज तुम मुक्षसे विदा हो रही हो जो दिल प्यार के बंधन में बंध चुके हैं उन्हें समय स्थान या कोई भी आपति एक दूसरे से जुदा नहीं कर सकती राजकुमारी ने जबाव दिया लेकिन समय शरीर को धूल में मिला देती है उम्र प्यार की राशनी को फीका कर देती है दुरी की वजह से प्रेमी एक दुसरे को भुल जाते हैं क्या तुम अंदाज लगा सकती हो कि मैं किस तरह तुम्हारे प्यार का दीवाना हो चुका हूं अब मैं दोबारा तुमसे कैसे मिल सकता हूं राजकुमारी ने बडे धीरज के साथ जवाब दिया लोंगो के रास्ते में ऐसी कोई बाधा नहीं जो दूर न की जा सके केवल बुद्धि से काम लेने की जरूरत है।’’ विदा का समय आ गया। सुबह जाने से पहले आकिलखान ने राजकुमारी से कहा’’इस जहां में तुम कहीं भी रहो, मै तुम्हारी पास जरूर करूगां।’’ इस समय जैबुन्न्सि बहोश होकर गिर पडी तुरन्त हकिमों को बुलाया गया उन्होंने सलाह दी कि राजकुमारी को अभी दिल्ली न ले जाया जाए कारण वे बहुत कमजोर मालुम पड रही हैं उनकी सलाह पर औरगंजेब ने राजकुमारी को लाहोर में छोड दिया और वें स्वय दिल्ली वापस चले गये आकिलखान को खास तौर पर राजकुमारी की देखभाल करने के आदेश दिये गये जैबुन्निसा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई इसी खुशी में औरगंजेब ने उसे दो माह के लिए और लाहौर में रहने की अनुमति दे दी ताकि वह वहां एक सुन्दर बगीचा बनवाकर अपनी यादगार कायम रख सके आकिल जैबुन्निसा के प्रेम में इतना दिवाना हो गया था कि उसे केवल उसे राजकुमारी को देखते रहने के लालच से वह बगीचे में मजदुर का काम करने लगा जब भी वह राजकुमारी के पास से गुजरता कविता कि एक पक्ंत कहा करता जिसका मतलब होता तेरे लिए में जमीन की धुल बन गया इसके जबाव में आकिल को चिढाने के लिए जैब भी कविता की एक कहती, जिसका मतलब था,’गर तुम हवा भी बन जाओ तो एक भी बाल नहीं छू सकते।’ खुशी के ये दिन भी पलक मारते बीत गये। औरगजेब के समय जासूसी प्रणाली अपने चरम विकास पर थी। उन दिनो दीवारो के भी कान होते थ्ंो। आकिल और जैब के प्यार का किस्सा भी उससे न छिप सका। पूरा किस्सा मालूम होने पर औरंगजेब के अचानक आने का कारण समझ गए। मिलन की आखिरी रात समझ आकिल वेश बदलकर जैबुनिसा के कमरे में गया। भय की कालिमा उसके हदय पर छाई हुई थी, किन्तु वह उस रात का सबसे अच्छा उपयोग करना चाहता था। उसने पूरी रात अपनी महबूबा के साथ गुजारने का निश्चय कर लिया। एक बहादूर की तरह वह शेर की गुफा में घुस गया। जैबुन्निसा ने खतरे को भंाप लियायफिर भी वह एक बहादुर की तरह, जिसे अपनी हार का विश्वास हो गया हो, मुस्कराती रही। आकिल को सामने देख, वह उठ खडी हुई और घायल हरिणी की तरह उसने एक नजर आकिल पर डाली। फिर वे दोनो खामोश बागीचे में घुमने लगे। उनका मौन उनके हदय की बात कह रहा था। अन्त में दोनो घास पर बैठ गए। जैब अपने आंसुओ को न रोक सकि और रोने लगी। आकिल यह देख बेचैन हो उठा और जैब को अपनी बाहो में भरकर बोला,’’हमे मुसीबत का सामना बहादूरी से करना चाहिए। इस दुनीया में नहीं तो अगले जन्म में हम अवश्य ही मिलेंगे। जैबुन्निसा जानती थी कि आकिल का भविष्य अंधकारमय है। औरंगजैब जानती थी कि आकिल का भविष्य अंधकारमय हैं। औरगजैब उसे बडी सजा देने से नहीं चूकेगा, इसलिए उसने क्षमा याचना करते हुए कहा,’’प्यारे आकिल, तुम्हारी सारी मुसीबतो का कारण मैं हू। इसके लिए मैं माफि चाहती हूं। आकिल ने समझते हुए कहा,’’तुम्हे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। इसमे किसीका दोष नहीं। दुनीया के लोग भले ही हमे एक-दुसरे से जुदा करने की कोशीश करें, लेकिन खुदा हमें अवश्य मिलाएगा।’’ आकिल ने फिर जैब को अपनी बाहो में जकड लिया। शायद वह रात उनके प्यारभरे जीवन की सबसे सुन्दर रात थी। जैब के आंसू खुशी में बदल गए और वह आकिल की गोद में पड गई। सबसे ज्यादा खुशी की वह रात पल-भर में बीत गई। बदला औरगजैब का बदला लेने का तरीका भी बिल्कूल अजीब था। वह अपने चेहरे पर जरा भी नाराजगी प्रकट नहीं होने देता था। और अपने मन की शांती को बनाए रखता था। राजकुमारी की देखभाल ठीक तरह से करने के लिए उसने आकिल की खूब तारीफ की और जैबुन्निसा को लेकर वह दिल्ली लौट गया। वहां जाकर वह जैबू की शादी जल्दी से जल्दी करके सारे मामले को दबा देना चाहता था। दसने खुब कोशिश की, लेकिन वह जैब को शादी के लिए तैयार न कर सका। जब उसने जैब पर बहुत दबाव डाला तो उसने एक दिन प्रश्न किया,’’ अब्बाजान, क्या आप मुझे अपना शरीकेहयात चुनने का मौका नहीं देंगे?’’ इसके जबाव में औरगंजेब ने उसे कई शाही परीवारों के लडकों के फोटो दिखाए और उसे अपना शौहर खुद चुन लेने का मौका दिया लेकिन जैबुन्निसा किसी के साथ शादी करने के लिए राजी नही हुई अन्त में उसने आकिलखान से शादी करने के अपना प्रस्ताव जाहिर किया उसकी सहेलिया यह खुशखबरी लेकर बादशाह के पास पहुंची इसे सुनकर औरंगजेब आपे से बाहर हो गया लेकिन उसने एक बार फिर अपनें क्रोध को दबाया और आकिलखान को बुलाने के लिए संदेश भेजा आकिलखान औरगंजेब के इरादे को अच्छी तरह समक्षता था उसके कर्मचारीयों ने भी उसे औरंगजेब के दरबार में जाने से आग्रह किया लेकिन उसमे औरगंजेब के हुक्म को टालने की हिम्मत नहीं थी और वह लाहौर छोडकर भाग खडा हुआ कुछ दिनो के बाद औरंगजेब का चोथा लडका अकबर बागी हो गया और उसने अपने पिता को कैद कर गदी प्राप्त करनी चाही कुछ समय बीतने पर आकिल भी चुफ से आकर अकबर की सेना में भरती हो गया इस उम्मीद से कि यदि औरंगजेब की पराजय हुई तो वह जैबुन्निसा से शादी करने में कामयाब हो सकेगा फिर उसने चुफ से जैबुन्निसा से खतोकिताबत शुरू कर दी जब आकिल अपने को काबु में न रख सका तो उसने जैबुन्निसा के बगीचे में माली का काम ले लिया और इस प्रकार वह फिर अपनी महबुबा से मिल गया बगीचे में दोनो घंटो तक साथ रहते और बातचीत करते औरंगजेब के जासुसो ने इसकी खबर उसे दी और उसने शीघ्र ही सारे मामले को सारे मामले को समक्ष लिया एक रात जब आकिल माली के वेश में जैबुन्निसा के कमरे में था औरंगजेब अपने नौकरों के साथ वहां पहुचा और उसने दरवाजे पर दस्तक दी बाहर जाने का कोई रास्ता न देख आकिल पहले धबराया फिर उसने यहां वहां देखा तो उसे पानी गर्म करने का एक बडा देग खाली दिखा और वह उसमें छिप गया फिर जैबुन्निसा ने जैब से पुछा इतनी रात तक तुम कैसे जाग रही हो अब्बाजान तबीयत ठीक न होने की वजह से मुक्षे नींद नहीं आ रही थी और इसलिए में बराडें में बैठकर कुरान शरिफ की तिलावत कर रही थी जैब ने जबाव दिया महल के इस सुने कमरे में इतनी रात तक अकेले जागते रहना एक राजकुमारी को शोभा नहीं देता जैब ने जैब औरंगजेब ने कहा चंद मिनटो क बाद औरंगजेब ने फिर कहा जैब उस बडे देग में क्या हैं इस पर जैबुन्निसा क्षण भर के लिए धबरा सी गई लेकिन फिर उसने अपने को संभालते हुए जबाव दिया कुछ नहीं अब्बाजान उसमें वजु कि लिए ठंडा पानी है औरंगजेब ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा इतनी ठंड में यदी तुम ठंडे पानी से वजु करोगी तो बीमार पड जाओगी उसे गर्म क्यों नहीं करवा लेतीं और फिर औरंगजेब के हुक्म के मुताबिक चुल्हा जलाया गया और पानी के देग को उपर रखा गया किसी बहाने से जैबुन्निसा चूल्हे के पास गई और उसने धीरे से आकिल से कहा यदि तुम सचमुच मुक्षसे मुहब्बत करते हो तो हम दोनो की इज्जत की खातिर जबान से उफ भी न करना मैं तो तुम्हारा परवाना हुं तुम्हारे लिए मैं खुशी से जल जाउगा उस परवरदिगार खुदाबंद से यही दुआ मांगता हुं कि जिस चीज को हम दुनिया में हासिल न कर सके उसे हम जन्नत में बख्शें आकिल ने जबाव दिया कुछ समय बाद औरंगजेब चला गया और आकिल देग के अन्दर जलकर मर गया जैब ने अपने प्यारे को अपने बगीचे में ही दफनाया दिन और रात जैब उस जगह वह आंसु बहाती और वहीं बैठकर शरीफ पढा करती कुछ दिनों तक जैब वहां बैठकर नज्मे बनाती रहती एक बार उसने एक नज्म लिखी जिसका मतलब था मुहब्बत की भी क्या किस्मत है दुनिया की खुशी के लिा उसे अपने आपको कुर्बान कर देना पडता है फिर जैबुन्निसा को आकिल की कब्र पर भी बैठने से मना कर दिया बाद में औरंगजेब को आकिल को लिखे गये जब के कुछ खत मिले और उसकी सजा उसने जैब को कैद में डाल दिया जैब की सारी जायदाद और चार लाख का उसका सालाना खर्च सब औरंगजेब ने जब्त कर लिया जैबुन्निसा ने अपनी जिन्दगी के इक्कीस साल कैदखाने में काट दिये और अन्त में २६ मई १७०२ को उसने इस बेरहम दुनिया से विदा ले ली कैद के दरमियान यघपि सारी दुनिया से उसके सम्बन्ध तोड दिये गये लेकिन वह नज्में बराबर लिखती रही अपनी आखिरी नज्म में उसने इन भावों को प्रकट किया कब तक मेरे इन पैरों में ये जंजीरे पडी रहेंगी मेरे सारे दोस्त दुश्मन हो गये सारे रिश्तेदार गैर बन गये मैं बदनामी से कैसे बच सकती हूं जब मेरे सारे दोस्त और हमदर्द ही मुक्षे बदनाम करने पर तुले है जैब अब तुम कैद से छुटकारा नहीं पा सकती ऐ जैब अब केवल मौत ही तुक्षे इस कैद से छुटकारा दिला सकती है।

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